Saturday, August 18, 2018

एक गांव में 96 साल से नही बढ़ी आबादी फिर भी मन की बात में जिक्र नही

मन की बात के लिए मनमर्जी की बात
एक गांव में 96 साल से नही बढ़ी आबादी फिर भी मन की बात में जिक्र नही
कांग्रेसी होने का या फिर बा के सिद्घांत पर अटल रहने का मिला उसे श्राप !
                                         सचित्र आलेख :- रामकिशोर दयाराम पंवार रोंढ़ावाला
1922 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दुसरे प्रांतीय अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जीवन संगनी स्वर्गीय श्रीमति कस्तुरबा गांधी ने पुण्य सलिला माँ सूर्यपुत्री ताप्ती के किनारे पारसडोह के समीप बसे गांव धनोरा में नारा दिया था छोटा - परिवार सुखी परिवार , उसी नारे को स्वर्गीय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री ने इमरजेंसी के समय दिया था। उनका नसबंदी का कार्यक्रम उनकी सत्ता के परिवर्तन की वजह बना लेकिन वह अपने सिद्धांत पर कायम रही। आज परिवार नियोजन लक्ष्यपूर्ति का माध्यम लोगो के लालच का कारण जरूर बन गया है लेकिन बीते 96 साल से पूरा गांव बिना किसी लालच के हम दो - हमारे दो , छोटा परिवार - सुखी परिवार के सिद्धांत पर अटल है। जिसका नतीजा यह निकला कि आज भी गांव टूट - टूट कर बिखर रहा है, गांव के टूटने और नए गांवो के बनने की प्रक्रिया ने गांव को अपने सिद्धांत से एक इंच भी हिला नही सकी। 1922 से आज तक गांव की आबादी दो हजार के आकड़े को पार नहीं कर सकी और उस गांव से टूट कर बने गांवो की आबादी चार गुणा बढ़ चुकी है।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बहुचर्चित कार्यक्रम में इस आदर्श गांव को शामिल करने की मांग पर जिले के लक्ष्यपूर्ति के माध्यम से शाबासी पाने के चक्कर में स्वास्थ विभाग के कर्मचारियों एवं अधिकारियों ने गांव की तस्वीर को अलग ढंग से पेश करके गांव के उज्जवल भविष्य पर कालिख पोतने का काम किया है। धनोरा गांव नसबंदी और नशाबंदी जैसे कार्यक्रम में स्वंय के योगदान पर लगाए गए पलीता से बेहद खफा है। मध्यप्रदेश - महाराष्ट्र की सीमा से लगे आदिवासी बाहुल्य बैतूल जिले के इस गांव को परिवार नियोजन का सिद्धांत उसके गले की फास बनता नज़र आ रहा है। इस गांव तक आने वाली सारी सरकारी योजनायें गांव तक आने से पहले ही गांव की आबादी का आकड़ा देख कर गांव तक पहुंचने से पहले मिस्टर इंडिया की तरह गायब हो जाती है। गांव के विकास को चिढ़ाती सरकारी योजना के हाल - बेहाल पर अब इस गांव को शायद इस बात पर जरूर अफसोस होने लगा है कि कहीं उसने छोटा - परिवार के चक्कर में जनसंख्या की लगाम को रोक कर अपने पैरो पर कुल्हाड़ी तो नही मार ली! गांव के सुरते हाल पर स्वर्गीय दुष्यंत कुमार की ए पंक्तियां यहां तक आते . आते सुख जाती है सभी नदियां , हमें मालूम है पानी कहां ठहरा होगा ! सटीक बैठती है। आज के दौर में धनोरा गांव की युवा पीढ़ी को अपने गांव का परिवार नियोजन अपनाने का सिद्घांत बेहद अफसोस जनक लग रहा होगा क्योकि गांव तक आने वाली विकास की गंगा जनसंख्या के आकड़े के चलते बीच रास्ते से कन्नी काट लेती है। कांग्रेसी होने का तथा स्वर्गीय कस्तुरबा गांधी का कटट्र समर्थक रहने वाले इस अद्घितीय गांव में 96 साल से कोई आबादी का आकड़ा दो हजार से ऊपर नही गया। आज शायद इसी त्रासदी का शिकार बना यह गांव विकास के दावो से अछुता रहा है। इस गांव के पूर्व सरपंच रघु जीवने का कहना है कि हमे तो कांग्रेसी होने की सजा मिल रही है। गांव के जिस चबुतरे पर स्वर्गीय श्रीमति कस्तुरबा गांधी ने मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री स्व.पंडित रविशंकर शुक्ल,स्व. सेठ गोविंद दास जी , स्व.जमना लाल बजाज ,राष्टकवि स्व. माखन लाल चतुर्वेदी , स्व.सुभद्रा कुमारी चौहान एवं स्व.पंडित सुन्दरलाल के आतिथ्य एवं बा की अध्यक्षता में सम्पन्न सम्मेलन में गांव के लोगो के बीच बा ने एक नारा दिया था छोटा परिवार सुखी परिवार , आज वही नारा गांव के विकास में पाचर का काम कर रहा है। हरिजन उद्घार के लिए निकली स्वर्गीय श्रीमति कस्तूरबा गांधी के ग्राम धनोरा में आने को आज पूरे 96 साल हो गये भी इस गांव के लोग अपनी नेत्री कस्तूरबा गांधी की सीख पर कायम है। इसी गांव के स्वर्गीय भिलाजी धोटे उस समय इस गांव के प्रमुख कांग्रेसी कार्यकत्र्ता थे जिनके जिम्मे कांग्रेस का पूरा आन्दोलन संचालित था। स्वर्गीय धोटे की तीसरी पीढ़ी में उनके सदस्या श्रीमति कल्पना धोटे को आज भी इस बात का गर्व है कि उसके घर के सामने मैदान में कांग्रेस का वह सम्मेलन हुआ था तथा बा उनके घर आई थी। हैदराबाद के चिकित्सालय में अपनी सर्जरी करवाने गये भदया जी धोटे की पत्नि श्रीमति यमुना बाई बताती है कि उसके सास- ससुर ने कांग्रेस के सिपाही के रूप में देश की आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी की जीवन संगनी श्रीमति कस्तूरबा गांधी के साथ भाग लिया था। सबसे पहले भिलाजी धोटे ने परिवार नियोजन का सिद्घांत अपनाया उसके बाद उसके बेटे भदया जी धोटे तथा अब उसी परिवार की तीसरी पीढ़ी की सदस्या श्रीमति कल्पना धोटे छोटा परिवार सुखी परिवार को अपना चुकी है। श्रीमति कल्पना धोटे अपनी सास के समक्ष गर्व के साथ कहती है कि आज हमारा पूरा गांव कांग्रेस धनोरा के नाम से जाना जाता है जिसके पीछे सिर्फ  एक ही कारण है कि मध्यप्रदेश के इस निर्मल गांव में आज भी छुआछुत का चक्कर नहीं है तथा अनपढ़ अशिक्षित गवार लोग से लेकर एम ए , एल एल बी पास लोग भी आजाद भारत के लगभग 72 साल के बाद भी छोटा परिवार सुखी परिवार के मूल सिद्घांत से रत्ती भर भी भटका नहीं है। आजाद भारत देश के इतिहास में सिर्फ  सरकारी मिशनरी कागजो पर ही देश की अरबो -खरबो जनता को हम दो - हमारे दो , छोटा परिवार - सुखी परिवार का संदेश गांव -गांव तक पहँुचाने के लिए अरबो - खरबो की राशी को पानी की तरह बहा चुकी है। इतना सब करने के बाद भी कोई भी केन्द्र एवं राज्यो में शासन करने वाली किसी भी दल की सरकार ताल ठोक कर ऐसा गांव को जनता के सामने उदाहरण के लिए प्रस्तुत नहीं कर सके जो कि कांग्रेस धनोरा के समकक्ष हो।
    बैतूल जिला मुख्यालय से मात्र 35 किमी दूर स्थित ग्राम कांग्रेस धनोरा के रहवासी लड़का हो या लड़की दोनो को एक समान समझते चले आ रहे हैं। इस गांव के 80 वर्षिय मायवाड़ दादा कहते है कि जब मैं पैदा भी नही हुआ था तब मेरे इस गांव में बा आई थी। मेरे पिताजी ने उनके दर्शन किये । मायवाड़ दादा अपने घर के चरखे को लाकर दिखाते है और कहते है कि मेरे माता . पिता को बा ने ही चरखा चला कर सूत बनाने की सीख दी थी। आज जो भी कारण हो इस गांव के हर घर के उन स्कूल जाने को इच्छुक बच्चो के भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ है कि गांव में स्कूल में आज तक उच्च पाठ शाला ही नहीं खुल सकी है। गांव में कई परिवार ऐसे हैंए जिन्होंने एक लड़की होने पर या दो लड़की होने पर भी परिवार नियोजन को अपना लिया। इसी वजह से पिछले 72 वर्षो में इस गांव में कुल 712 लोगों की वृद्घि हुई है। जिला योजना एवं सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों पर नजर डालें तो सन्ड्ढ 1950 में ग्राम धनोरा की कुल आबादी 1118 थी, जो 96 साल बाद बढ़कर 1757 हो गई। वहीं आसपास के गांवों के आंकड़ों पर नजर डालें तो ग्राम कांग्रेस धनोरा के पास ही बसे गांव जावरा 1950  में जो थी आज वही आबादी दोगुनी हो गई। ग्राम जावरा की 1950 की कुल आबादी 1166 थी जो अब बढ़कर 4332 हो चुकी है। समीप बसे ग्राम के ही ऐसे हालात है। जहां 1950 में आबादी 1001 थी जो बढ़कर 5032 हो गई, जो लगभग तीन गुना है। धनोरा ग्राम के ग्रामीणों द्वारा परिवार नियोजन को अपना लेने के पीछे मानना है कि 1922 में कस्तूरबा गांधी ने ग्रामीणों को परिवार नियोजन के फायदे बताए और हमेशा परिवार नियोजन को अपनाने और उस पर अमल करने की अपील की थी। उस अपील समय से ही पूरे गांव पर बा का हुआ जबरदस्त असर आज भी देखने को मिलता है। स्वर्गीय कस्तूरबा गांधी के बाद कई नेता आए और चले गए लेकिन ग्रामीणों ने परिवार नियोजन वाली बात को गांठ बांध ली और तब से ही ग्रामीण परिवार नियोजन को अपनाते चले आ रहे। ग्राम के पूर्व सरपंच रघु जीवने के अनुसार गांव वालों द्वारा परिवार नियोजन को अपनाने से गांव की आबादी नहीं बढ़ी। आबादी नहीं बढऩे की वजह से कई ऐसी सरकारी योजनाएं जो कि गांव की आबादी के अनुसार गांव को मिलती है। ऐसी कई योजनाएं गांव की आबादी कम होने की वजह से गांव में नहीं आ पाई। आबादी कम होने की वजह से कई सरकारी योजनाएं गांव तक आकर वापस हो गईण् उन्होंने बताया कि आबादी की कमी की वजह से गांव तक पहुंचने के लिए आज तक पक्की सड़क का निर्माण नहीं हो पाया है। आज भी ग्रामीणों को गांव तक पहुंचने के लिए पैदल चलकर आना पड़ता है और बारिश के दिनों में तो हालात और बद से बदतर हो जाते हैं। ग्रामीणों का पैदल चलना तक मुश्किल हो जाता है। एक लड़की के बाद ही परिवार नियोजन को अपना लेने वाले गांव के जगदीश पंवार जो स्वंय स्वास्थ र्मी है वे कहते है कि मेरी सिर्फ  एक ही लड़की है तो क्या हुआ जरूर मेरी लाड़ली एक दिन यह साबित कर देगी कि लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं होता है। गांव के विकास के बारे में वे भी मानते है कि कई सरकारी योजनाएं गांव में कम आबादी की वजह से नहीं आ पाई है। गांव के रहवासी बलवंत भैया कहते है कि परिवार नियोजन से परिवारों को मिलने वाले ग्रीन कार्ड भी वक्त पडऩे पर काम नहीं आते हैं ! कई बार चिकित्सालयों में ग्रीन कार्ड दिखाने पर डाक्टर इस कार्ड का कोई फायदा नहीं देते उल्टे इसे फेंक देने की सलाह देते है। ऐसे में परिवार नियोजित इस गांव को अन्य लाभ मिलना तो दूर की बात है। ग्राम कांग्रेस धनोरा में पिछले 91 वर्षो में मात्र 600 लोगों की वृद्घि होना और इतने ही समय में आसपास के गांवों में दोगुनी- तिगुनी वृद्घि होना यह साबित करती है कि ग्राम कांग्रेस धनोरा एक आदर्श और परिवार नियोजित गांव है। अधोसंरचना और तमाम मूलभूत सुविधाओं से जूझते हुए इस गांव ने परिवार नियोजन को अपनाकर एक मिसाल तो कायम कर ली। वहीं अपने आप को विकास से कोसो दूर कर लिया।
केन्द्र की कहे या राज्य की भाजपा शासित सरकार को कांग्रेस या राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जीवन संगनी कस्तुरबा गांधी (बा)  के नाम एवं काम से एलर्जी है या फिर केन्द्र एवं राज्य सरकार के अफसर नही चाहते कि कांग्रेस या श्रीमति कस्तुरबा गांधी  बा का नाम एवं काम पूरी दुनिया में मिसाल - बेमिसाल बने। बैतूल जिले के क्रियाशील पत्रकार एवं माँ सूर्यपुत्री ताप्ती जागृति समिति के प्रदेश अध्यक्ष रामकिशोर पंवार ने बैतूल जिला कलैक्टर के माध्यम से जिले के एक गांव धनोरा (कांग्रेस धनोरा) का नाम परिवार नियोजन अपनाने के चलते प्रधानमंत्री मन की बात कार्यक्रम में शामिल करवाने को लेकर की गई पहल पर बैतूल जिले में पोती गई कालिख का आरटीआई आवेदन में खुलासा हुआ है। प्रधानमंत्री के गृहराज्य गुजरात की स्वर्गीय कस्तुरबा पत्नि राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बा) के बताए सिद्धांत पर चलने वाले गांव की आबादी वर्ष 2001 में इस गांव में पुरूषो की संख्या 839 तथा महिलाओं की संख्या 803 कुल जनसंख्या 1642 वही वह 2011 में पुरूषो की संख्या भी 884 तथा महिलाओ की संख्या 803 कुल जनसंख्या 1687 थी। वर्तमान में 950 पुरूष तथा 807 महिला कुल 1757 है। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले की आठनेर जनपद की ग्राम पंचायत धनोरा के मूल ग्राम धनोरा ( जिसे कांग्रेस धनोरा के नाम से पुकारते है ) में कुल मकान 324 है तथा परिवारो की संख्या 371 है। धनोरा में कुल योग्य दपंत्ति 257 में  सरकारी रिकार्ड की माने तो 184 ने स्वत: परिवार नियोजन को अपनाया है।  इस गांव का नाम प्रधानमंत्री के कार्यक्रम मन की बात में शामिल करने के लिए श्री पंवार ने पीएमओ से लेकर बैतूल कलैक्टर तक से बीते 2 वर्षो से लगातार पत्राचार किया लेकिन गांव का नाम कांग्रेस धनोरा और गांव की प्रेरक के रूप में स्वर्गीय श्रीमति कस्तुरबा गांधी का नाम आने की वजह से मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार एवं उसका सरकारी तंत्र इस गांव का नाम पीएमओ तक नही पहुंचने दिया। पीएमओ से लेकर कलैक्टर बैतूल तक को इस गांव के बारे में भ्रामक जानकारी दी जाते रही। आरटीआई एक्टीविस्ट एवं समाजसेवी श्री पंवार ने विभिन्न माध्यमो से प्राप्त संलग्र दस्तावेज के आधार पर जानकारी देते हुए बताया कि गांव के बारे में डाँ प्रदीप मोजेस जिला  मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने दिनांक 6 फरवरी 2016 को पत्र क्रमांक मीडिया / 2015-2016 /3235 एवं 36 /  2016 के अनुसार बैतूल कलैक्टर को जानकारी दी कि गांव धनोरा में 2 से लेकर 5 बच्चो पर आपरेशन करवाने वाले हितग्राही है इसलिए इस गांव का नाम पीएमओ की के कार्यक्रम मन की बात में शामिल किया जाना तथ्यहीन है। लेकिन रामकिशोर पंवार द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जब सभी परिवार नियोजन अपनाने वाले दंपत्ति की जानकारी मांगी गई तो उसमें जो प्रमाण आए उसके अनुसार गांव में एक भी ऐसा परिवार नहीं मिला जिनकी 5 संताने थी । इसी तरह 4 बच्चो पर आपरेशन करवाने वालो की संख्या पहले 23 बताई गई लेकिन जब नामो की सूचि मांगी गई तो उसमें संख्या 4 बच्चो पर अटक गई। 4 बच्चो पर आपरेशन करवाने वालो के 5 लोगो की जानकारी दी जिसके बारे में जब मैने पता किया तो पता चला कि वे गांव के मूल रहवासी नही है। बाहर गांव से आकर बसे ऐसे 5 परिवारो को सूचिबद्ध किया गया। 3 बच्चो पर नसबंदी करवाने वालो की पूर्व में संख्या 52 बताई गई लेकिन जब नाम की जानकारी मांगी तो उक्त संख्या 12 हो गई। इसी तरह 2 बच्चो पर नसबंदी करवाने वालो की संख्या 104 बताई गई जो घट कर 43 रह गई। पूर्व में दी गई जानकारी में बताया गया कि 184 लोगो ने नसबंदी करवाई ऐसा बताया गया लेकिन जानकारी सूचि मांगने पर संख्या घट कर 60 हो गई। स्वर्गीय कस्तुरबा गांधी बा के द्वारा प्रेरित इस गांव की जनसंख्या 1961 में 1410 थी जो वर्तमान में 1757 के लगभग है। मात्र 58 वर्षो में गंाव की जनसंख्या 277 बढ़ी है। 1922 से गांव धनोरा से टूट कर पुसली, धनोरी, जावरा , जैसे गांव  बने और इन गांवो की जन संख्या वर्तमान में 2 हजार से ऊपर 5 हजार तक हो चुकी है लेकिन धनोरा गांव 1922 से लेकर 2018 तक दो हजार के आकड़े को छूना तो दूर 18 सौ के आकड़े तक नहीं पहुंच सका है। गांव के बारे में जो महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए है उनके अनुसार धनोरा गांव में ऐसे लोगो की संख्या 19 है जिनके 1 भी बच्चा नहीं है। 1 बच्चे वाले 30 परिवार,  2 बच्चे वाले 14  परिवार तथा 3 बच्चे वाले 10 परिवार मिले। धनोरा गांव में कथित निरोध का उपयोग करने वाले 22 दपंत्ति बताए गए है। गांंव की जन्मदर 8.53 है। गांव में औसतन एक साल में बमुश्कील 15 बच्चे जन्म लेते है। बैतूल जिले के अधिकारियों ने सरकारी लक्ष्यपूर्ति के लिए स्वप्रेरित गांव को नसबंदी अपनाने वाला बता कर गांव के आदर्श को कालिख पोतने का काम किया है। दुनिया में धनोरा एक मात्र ऐसा गांव है जो 1922 से लेकर आज तक परिवार नियोजन के अपने फैसले पर अटल है जबकि गांव के अधिकांश लोग अब इस दुनियां में नहीं है जो बा की बातो को लेकर चल पड़े थे कि छोटा परिवार - सुखी परिवार , हम दो - हमारे दो । श्री पंवार ने देश के प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी को पत्र लिख कर उनसे अनुरोध किया है कि उन्हे बड़ी प्रसन्नता होगी यदि आप मेरे कहने पर या मेरे इस पत्र को अवलोकन करने के बाद यदि बिना किसी भेदभाव के इस गांव को अपने कार्यक्रम मन की बात में शामिल करते है। श्री पंवार ने इस संदर्भ में इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ को भी पत्र लिखा है जिसमें उनसे आग्रह किया है कि 1922 में कांग्रेस के प्रांतीय अधिवेशन में लिए गए संकल्प पर वचनबद्ध गांव धनोरा जिसकी पहचान कांग्रेस धनोरा के रूप में भी है उस गांव को लेकर एवं बा की प्रेरणा को पूरी दुनिया तक मिसाल के रूप में पेश करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर एक कार्य योजना के साथ सामने आना चाहिए साथ ही देश के सशक्त विपक्ष के रूप में प्रधानमंत्री के समक्ष इस गांव को उनके कार्यक्रम मन की बात में शामिल करवाना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो निश्चीत तौर पर उस कांग्रेस की नींव की पत्थर कही जाने वाली गुजराती महिला स्वर्गीय कस्तुरबा गांधी बा का मान - सम्मान पूरी दुनियां में बढ़ेगा जो इस दुनियां में धनोरा जैसा आदर्श गांव को बनाने में मिल का पत्थर साबित हुई।

Thursday, March 2, 2017

Mahatama Gandhi Ke Nam par Loot

रोजगार ग्यारंटी योजना के फर्जीवाडे के बाद भी
बैतूल जिला प्रदेश एवं केन्द्र सरकार से पुरूस्कृत............!
बैतूल से रामकिशोर पंवार की खास रिर्पोट
बैतूल। भारत सरकार के ग्रामिण रोजगार मंत्रालय द्वारा रोजगार ग्यारंटी योजना के तहत बीते वर्ष की 2 फरवरी 2006 को मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य बैतूल जिले में इस योजना के प्रथम चरण का श्रीगणेश किया गया। इस योजना के तहत 3 लाख 85 हजार 37 अकुशल कामगारो को रोजगार दिया गया। इस योजना के कथित सफल क्रियाव्यन के लिए बैतूल जिले को मध्यप्रदेश में पहला स्थान मिला। शासन ने 30 प्रतिशत महिला कामगारो को रोजगार देने का बैतूल जिले के लिए लक्ष्य रखा था लेकिन जिले ने 40 प्रतिशत महिलाओं को काम दिया गया। जिन सरकारी आकडो पर बैतूल जिले ने मध्यप्रदेश में अव्वल नम्बर का स्थान पाया उस आकडो में बताया गया कि राष्ट्रीय रोजगार ग्यारंटी योजना के तहत बैतूल जिले की 558 ग्राम पंचायतो के मे बसे 1हजार 343 ग्रामों के 2 लाख 33 हजार 707 जाबकार्ड धारको को 16771. 495 लाख रूपये की राशी का भुगतान किया गया। बैतूल जिले में इस योजना के तहत आज दिनांक 15 हजार 495 कार्य पूर्ण होना तथा 12 हजार 85 कार्य प्रगति पर बताया गया। मध्यप्रदेश के इस आदिवासी बाहुल्य जिले की कुल आबादी 13 लाख 95 हजार 175 है। केन्द्र सरकार के द्धारा मध्यप्रदेश के बालाघाट एवं बैतूल जिले को राष्ट्रीय ग्रामिण रोजगार ग्यारंटी योजना के तहत कपिलधारा के योजना के तहत 14 हजार 893 में से कथित 5 हजार 797 कुओ के पूर्ण निमार्ण कार्य के लिए एवं शेष के निमार्ण कार्य की प्रगति के लिए शाबासी मिली। इन आकडो की सच्चाई को जानने के लिए कपिलधारा योजना के तहत खुदवाये गये कुओ के कथित निमार्ण कार्य में बडे पैमाने पर भ्रष्ट्राचार एवं निमार्ण कार्य की गुणवत्ता के चलते बासपानी की एक युवती की जान तब चली गई जब एक बार धंस चुके कुये को पुन: बनवाया जा रहा था। बासपुर ग्राम पंचायत द्धारा बीते वर्ष 2008 में ग्राम पंचायत के एक कपिलधारा योजना के लाभार्थी रमेश का कुआ पिछली बरसात के बाद पूरी तरह धस गया। उक्त कुये को बिना स्वीकृति के पुरानी तीथी में निमार्णधीन दर्शा कर उसका निमार्ण कार्य किया जा रहा था लेकिन ग्राम पंचायत के एक पंच तुलसीराम सहित 5 अन्य मजदुर गंभीर रूप से घायल हो गये तथा एक युवती सनिया की जान चली गई। कुये में धंस कर जान गवा चुकी सनिया को उसके काम की मजदुरी भी पूरी नहीं मिल सकी और वह कपिलधारा योजना के तहत निमार्णधीन घटिया कार्यो की बेदी पर चढा दी गई।  बैतूल जिले में जिला मुख्यालय पर जिले की किसी न किसी ग्राम पंचायत में कपिलधारा योजना के तहत निमार्णधीन कुओ के निमार्ण कार्य एवं मजदुरी का मामला लेकर दर्जनो ग्रामिणो का जमावडा आम बात रहने के बाद भी भाजपा शासनकाल में बैतूल जिला कलैक्टर को पदोन्नति के बाद भी अपनी इच्छानुसार बैतूल में अगंद के पाव की तरह जमे बैतूल रहे पूर्व कलैक्टर अरूण भटट को राजनैतिक एवं प्रशासनिक क्षेत्र में प्रदेश के मुख्यमंत्री के कथित एजेंट के रूप में देखा जा रहा है। स्वंय बैतूल पूर्व कलैक्टर मुख्यमंत्री के कथित सदस्य एवं मुख्यमंत्री की जीवन संगनी श्रीमति साधना सिंह के कथित भाई के रूप में प्रचारित करवा कर उनके लिए हर तरह के कार्य कर रहे है और यही कारण है कि उन्होने मुख्यमंत्री के प्रति अपने कथित विश्वास को उनकी पार्टी की लोकसभा उप चुनाव एवं विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के रूप में जीवित रखा है। बैतूल जैसे पिछडे जिले में जिला पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारी के रूप में कार्य कर चुके अरूण भटट के समय के ताप्ती सरोवर आज पूरे जिले में सुखे पडे है तथा कई तो अपने मूल स्वरूप को खो चुके है। इस जिले में रोजगार ग्यारंटी योजना के तहत कम मजदुरी एवं अकुशल श्रमिको के शारीरिक - मानसिक - आर्थिक शोषण को लेकर श्रमिक आदिवासी संगठन एवं समाजवादी परिषद श्रमिक नेता मंगल सिंह के नेतृत्व में बीते वर्ष 2006 से लेकर 2 फरवरी 2009 तक सैकडो धरना - प्रदर्शन कर चुके है। विधानसभा में काग्रेंस के विधायक सुखदेव पांसे भी उस योजना में व्यापत भ्रष्टाचार एवं मजदुरो के शोषण का मामला उठा चुके जिस योजना के लिए बैतूल कलैक्टर राज्य एवं केन्द्र सरकार से अपनी पीठ को थपथपा चुके है। बैतूल जिले के जिन कपिलधारा के कुओ को वरदान बताया जा रहा है उन कुओ के निमार्ण कार्य में जिन लोगो को लाभार्थी दर्शाया गया है उनमें से कई ऐसे हितग्राही है जिनके पुराने कुओ को नया बता कर कुओ के लिए स्वीकृत राशी को सरपंच - सचिव - इंजीनियर एवं सबंधित योजना के अधिकारी आपस में बाट कर खा गये। हितग्राही को सरकारी कागजो पर उसके कुये के बदले में कुल स्वीकृत राशी का दस प्रतिशत भी नहीं मिल पाया है। बैतूल जिले के दर्जनो हितग्राहियो के नाम ऊंगली पर गिनाये जा सकते है जिनके पुराने कुओ को सरकारी कागजो में नया बता कर फजी रोजगार उन जाबकार्डो में दर्शाया गया है जिन्हे साल में निर्धारित दिवस का रोजगार तक वास्तवीक रूप में नहीं मिल सका है।
                    बैतूल जिले में कपिलधारा उपयोजना के तहत 17 हजार 147 ऐसे हितग्राही चिन्हीत किये गये है जिन्हे कपिल धारा योजना का लाभ दिया जाना है। जिले में 14 हजार 893 कपिलधारा कुओ के निमार्ण कार्यो के लिए 12634 . 38 लाख रूपये स्वीकृत किये गये है। जिले में 5 हजार 797 कपिलधारा के कुओ के लिए 5114 . 34 लाख रूपये खर्च कर डाले गये। इन पंक्तियो के लिखे जाने तक कपिलधारा उप योजना के 8 हजार 16 कुओ के 7520 . 04 रूपये खर्च होना बाकी है इन सभी कार्यो की गुण्वत्ता की बात करे तो पता चलता है कि जिले की अधिकांश ग्राम पंचायतो के सरपंच एवं सचिव रोजगार ग्यारंटी योजना के बाद से सडकछाप के बदले अब टाटा इंडिका में घुमने लगे है। भाजपा शासन काल में शुरू की गई कपिल धारा कूप निमार्ण योजना को इस बरसात में श्राप लगने वाला है। केन्द्र सरकार द्घारा दिये गये रोजगार ग्यारंटी योजना के तहत दिये गये अनुदान से मध्यप्रदेश में शुरू की गई कपिल कूप योजना के तहत बैतूल जिले की दस जनपदो एवं 545 ग्राम पंचायतो में बनने वाले 14 हजार 893 कुओं में से लगभग आधे 6 हजार 934 कुओ में से अधिकांश पहली ही बरसात में धंसक चुके है। इन पंक्तियो के लिखे जाने तक मात्र 2 हजार 477 कुओं का ही पूर्ण निमार्ण कार्य पूरा हो चुका है। राज्य शासन द्घारा अनुसूचित जाति एवं जनजाति के ग्रामिण किसानो की 5 एकड़ भूमि पर 91 हजार रूपये की लागत से खुदवाये जाने वाले कुओं के लिए बैतूल जिला पंचायत एनआरजीपी योजना के तहत मोटे तौर पर देखा जाये तो 91 हजार रूपये के हिसाब से करोड़ो रूपयो का अनुदान केन्द्र सरकार से मिला। ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच एवं सचिव को कपिल धारा कूप निमार्ण की एजेंसी नियुक्त कर जिला पंचायत ने ग्राम के सरंपचो एवं सचिवो की बदहाली को दूर कर उन्हे मालामाल कर दिया है। एक - एक ग्राम पंचायत में 20 से 25 से कपिल धारा के कुओं का निमार्ण कार्य करवाया गया। 24 हजार 75 हजार रूपये जिस भी ग्राम पंचायत को मिले है उन ग्राम पंचायतो के सरपंचो एवं सचिवो ने एनआरजीपी योजना के तहत कार्य करवाने के बजाय कई कुओं का निमार्ण कार्य जेसीबी मशीनो से ही करवाया डाला। आनन - फानन कहीं सरकारी योजना की राशी लेप्स न हो जाये इसलिए सरपंचो ने बैतूल जिले में 545 ग्राम पंचायतो में इस वर्ष 2 हजार 477 कुओं का निमार्ण कार्य पूर्ण बता कर अपने खाते में आई राशी को निकाल कर उसे खर्च कर डाली। हर रोज जिला मुख्यालय पर कोई न कोई ग्राम पंचायत से दर्जनो मजदुर अपनी कपिल धारा योजना के तहत कुओं के निमार्ण की मजदुरी का रोना लेकर आता जा रहा है। अभी तक जिला प्रशासन के पास सरकारी रिकार्ड में दर्ज के अनुसार 337 ग्राम पंचायतो की शिकायते उन्हे अलग - अगल माध्यमो से मिली है। इन शिकायतो में मुख्यमंत्री से लेकर जिला कलैक्टर का जनता तथा सासंद का दरबार भी शामिल है। आये दिन किसी न किसी ग्राम पंचायत की कपिल भ्रष्टï्राचार धारा के बहने से प्रभावित लोगो की त्रासदी की $खबरे पढऩें को मिल रही है। अभी तक 9 हजार 411 कुओं  का निमार्ण कार्य हो रहा है जिसमें से 6 हजार 934 कुओं के मालिको का कहना है कि उनके खेतो में खुदवाये गये कुएं इस बरसात में पूरी तरह धंस जायेगें। मई 2008 तक की स्थिति में जिन कुओं का निमार्ण हो रहा है उनमें से अधिकांश के मालिको ने आकर अपनी मनोव्यथा जिला कलैक्टर को व्यक्त कर चुके है। सबसे ज्यादा चौकान्ने वाली जानकारी तो यह सामने आई है कि बैतूल जिले के अधिकांश सरपंचो ने अपने नाते -रिश्तेदारो के नामों पर कपिल धारा के कुओं का निमार्ण कार्य स्वीकृत करवाने के साथ - साथ पुराने कुओं को नया बता कर उसकी निमार्ण राशी हड़प डाली। जिले के कई गांवो में तो इन पंक्तियो के लिखे जाने तक पहली बरसात के पहले चरण मेें ही कई कुओं के धसक जाने की सूचनायें ग्रामिणो द्घारा जिला पंचायत से लेकर कलैक्टर कार्यालय तक पहँुचाई जा रही है। हाथो में आवेदन लेकर कुओं के धसक जाने , कुओं के निमार्ण एवं स्वीकृति में पक्षपात पूर्ण तरीका बरतने तथा कुओं के निमार्ण कार्य लगे मजदुरो को समय पर मजदुरी नहीं मिलने की शिकायते लेकर रोज किसी न किसी गांव का समुह नेताओं और अधिकारियों के आगे पीछे घुमता दिखाई पड़ ही जाता है। ग्रामिण क्षेत्रो में खुदवाये गये कपिल धारा के कुओं को डबल रींग की जुड़ाई की जाना है लेकिन कुओं की बांधने के लिए आवश्क्य फाड़ी के पत्थरो के प्रभाव नदी नालो के बोल्डरो से ही काम करवा कर इति श्री कर ली जा रही है। कुओं की बंधाई का काम करने वाले कारीगरो की कमी के चलते भी कई कुओं का निमार्ण तो हो गया लेकिन उसकी चौड़ाई और गहराई निर्धारीत मापदण्ड पर खरी न उतरने के बाद भी सरपंच एवं सचिवो ने सारी रकम का बैंको से आहरण कर सारा का सारा माल ह$जम कर लिया। जिले में एनआरजीपी योजना का सबसे बड़ा भ्रष्टï्राचार का केन्द्र बना है कपिल धारा का कुआं निमार्ण कार्य जिसमें सरपंच और सचिव से लेकर जिला पंचायत तक के अधिकारी - कर्मचारी जमकर माल सूतने में लगे हुये है। भीमपुर जनपद के ग्राम बोरकुण्ड के सुखा वल्द लाखा जी कामडवा वल्द हीरा जी  तुलसी जौजे दयाराम , रमा जौजे सोमा , नवलू वल्द जीवन , तुलसीराम की मां श्रीमति बायलो बाई जौजे बाबूलाल , चम्पालाल वल्द मन्नू के कुओं का निमार्ण कार्य तो हुआ लेकिन सभी इस बरसात में धंसक गये। बैतूल जिला मुख्यालय से लगभग 120 किलो मीटर की दूरी पर स्थित दुरस्थ आदिवासी ग्राम पंचायत बोरकुण्ड के लगभग सौ सवा सौ ग्रामिणो ने बैतूल जिला मुख्यालय पर आकर में आकर दर्जनो आवेदन पत्र जहां - तहां देकर बताया कि ग्राम पंचायत में इस सत्र में बने सभी 24 कुओं के निमार्ण कार्य की उन्हे आज दिनांक तक मजदुरी नहीं मिली। बैतूल जिले की साई खण्डारा ग्राम पंचायत निवासी रमेश कुमरे के परतापुर ग्राम पंचायत में बनने वाले कपिलधारा के कुओं का निमार्ण बीते वर्ष में किया गया। जिस कुये का निमार्ण वर्ष 2007 में पूर्ण बताया गया जिसकी लागत 44 हजार आंकी गई उस कुये का निमार्ण पूर्ण भी नहीं हो पाया और बीते वर्ष बरसात में धंस गया। दो साल से बन रहे इस कुये का इन पंक्तियो के लिखे जाने तक बंधाई का काम चल रहा है लेकिन न तो कुआं पूर्ण से बंध पाया है और न उसकी निर्धारित मापदण्ड अनुरूप खुदाई हो पाई है। इस बार भी बरसात में इस कुये के धसकने की संभावनायें दिखाई दे रही है। रमेश कुमरे को यह तक पता नहीं कि उसके कुआ निमार्ण के लिए ग्राम पंचायत को कितनी राशी स्वीकृत की गई है तथा पंचायत ने अभी तक कितने रूपयो का बैंक से आहरण किया है। ग्राम पंचायत के कपिलधारा के कुओ के निमार्ण कार्य में किसी भी प्रकार की ठेकेदारी वर्जित रहने के बाद भी कुओं की बंधाई का काम ठेके पर चल रहा है।
                    ग्राम पंचायत झीटापाटी के सरपंच जौहरी वाडिया के अनुसार ग्राम पंचायत झीटापाटी में 32 कुओ का निमार्ण कार्य स्वीकृत हुआ है लेकिन सरपंच ने कुओ के निमार्ण के आई राशी का उपयोग अन्य कार्यो में कर लिया। गांव के ग्रामिणो की बात माने तो पता चलता है कि इस ग्राम पंचायत में मात्र 16 ही कुओ का निमार्ण कार्य हुआ। सरपंच जौहरी वाडिया और सचिव गुलाब राव पण्डागरे ने इन 16 कुओ के निमार्ण कार्य में मात्र 6 लाख रूपये की राशी खर्च कर शेष राशी का आपसी बटवारा कर लिया। आर्दश ग्राम पंचायत कही जाने वाली आमला जनपद की इस ग्राम पंचायत में आज भी 16 कुओ का कोई अता - पता नहीं है। पहाड़ी क्षेत्र की पत्थरो की चटटïनो की खदानो का यह क्षेत्र जहां पर 16 कुओ जिस मापदण्ड पर खुदने चाहिये थे नहीं खुदे और जनपद से लेकर सरपंच तक ने 16 कुओ की खुदाई सरकारी रिकार्ड में होना बता कर पूरे पैसे खर्च कर डाले। सवाल यह उठता है कि जहाँ पर पत्थरो की चटटनो को तोडऩे के लिए बारूद और डिटोनेटर्स का उपयोग करना पड़ता है वहां पर कुओ का निमार्ण कार्य उसकी चौड़ाई - गहराई अनरूप कैसे संभव हो गया..? कई ग्रामवासियो का तो यहां तक कहना है कि सरपंच और सचिव ने उनके कुओ की बंधाई इसलिए नहीं करवाई क्योकि पहाड़ी पत्थरो की चटटनी क्षेत्र के है इसलिए इनके धसकने के कोई चांस नहीं है। भले ही इन सभी कुओ की बंधाई सीमेंट और लोहे से न हुई हो पर बिल तो सरकारी रिकार्ड में सभी के लगे हुये है। इस समय पूरे जिले में पहली ही रिमझीम बरसात से कुओं का धसकना जारी है साथ ही अपने कुओ पर उनके परिजनो द्घारा किये गये कार्य की मजदुरी तक उन्हे नहीं मिली। ग्रामिणो का सीधा आरोप है कि महिला अशिक्षित एवं आदिवासी होने के कारण उसका लड़का ही गांव की सरपंची करता रहता है। राष्टï्रपिता महात्मा गांधी का पंचायती राज का सपना इन गांवो में चकनाचूर होते न$जर आ रहा है क्योकि कहीं सरपंच अनपढ़ है तो कई पंच ऐसे में पूरा लेन - देन सचिवो के हाथो में रहता है। अकसर जिला मुख्यालय तक आने वाली अधिकांश शिकायतो और सरंपचो को मिलने वाले धारा 40 के नोटिसो के पीछे की कहानी पंचायती राज में फैले भ्रष्टï्राचार का वाजीब हिस्सा न मिलने के चलते ही सामने आती है। बैतूल जिले में 545 ग्राम पंचायतो के सरपंचो और सचिव के पास पहले तो साइकिले तक नहीं थी अब तो वे नई - नई फोर व्हीलर गाडिय़ो में घुमते न$जर आ रहे है। जिले में सरपंच संघ और सचिव संघ तक बन गये है जिनके अध्यक्षो की स्थिति किसी मंत्री से कम नहीं रहती है। अकसर समाचार पत्रो में सत्ताधारी दल के नेताओं और मंत्रियो के साथ इनके छपने वाले और शहरो में लगने वाले होर्डिंगो के पीछे का खर्च कहीं न कहीं पंचायती राज के काम - काज पर ऊंगली उठाता है। बैतूल जिले में अभी तक अरबो रूपयो का अनुदान कपिलधारा के कुओ के लिए आ चुका है लेकिन रिजल्ट हर साल की बरसात में बह जाता है। अब राज्य सरकार केन्द्र सरकार से मिलने वाले अनुदानो का अगर इसी तरह हश्र होने देगी तो वह दिन दूर नहीं जब पंचायती राज न होकर पंचायती साम्राज्य बन जायेगा जिसके लिए बोली लगेगी या फिर गोली......
                            जिले में स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत 3 हजार 895 स्वसहायता समूहो के लिए वर्ष 2007 एवं 2008 में 770.72 लाख रूपये का ऋण स्वीकृत कर उन्हे रोजगार शुरू करने के लिए दिये जा चुके है लेकिन जिले में कई ऐसे फजी स्वसहायता समूह के नाम उजागर हुये जिनके नाम और काम की कथित आड लेकर सरकारी रूपयो की हेराफेरी की गई है। बैतूल जिले में 5182.739 लाख रूपये में 1हजार 481 ग्रामिण सडको का निमाण कार्य करवाया गया है उनमें से अधिकांश सडको का निमार्ण कार्य भाजपाई ठेकेदारो द्धारा करवाय जाने से अधिकंाश सडके अपने मूल स्वरूप को खो चुकी है। जिले में 3132.280 लाख रूपये से 5 हजार 590 जल संरक्षण के कार्य करवाये गये उसके बाद भी जिले का जल स्तर नहीं बढ सका है। बैतूल जिले को सुखा अभाव ग्रस्त जिला घोषित किया गया है। जिले में इन पंक्तियो के लिखे जाने तक 21 लाख पौधो का रोपण कार्य कागजा पर दिखा कर सरकारी राशी को खर्च तो कर डाला है पर जिले में इन पंक्तियो के लिखे जाने तक कथित हरियाली के दावो को जिले में बडे पैमाने पर होने वाली अवैध कटाई से न देख कर उन पौधो की ही बात की जाये तो एक कडवी सच्चाई यह सामने आ रही है कि जिले में बमुश्कील दस लाख पौधे भी जीवित स्थिति में नहीं है। जिले में नंदन फलोउद्यान योजना का यह हाल है कि जिले में इस योजना के तहत शाहपुर जनपद में बुलवाये गये हजारो पौधे रापित होने के पूर्व ही काल के गाल में समा गये। जिन 4 हजार 226 चिन्हीत हितग्राही में से मात्र 2 हजार 630 हितग्राहियो को कुल स्वीकृत 2243.620 हेक्टर भूमि में से मात्र 353.181 हेक्टर भूमि पर 58 हजार 883 पौधो को लगाने के लिए नंदन फलोउद्यान योजना को लंदन फलोउद्यान योजना समझ कर सरपंच एवं सचिवो ने अपने आला अफसरो के साथ मिल कर खुब लूट - खसोट की। जिले में स्वीकृत राशी 1380.427 लाख रूपये में से 107. 343 लाख रूपये कथित हरियाली में खुशीयाली सिद्धांत को प्रतिपादित करने के नाम खर्च कर डाली गई।  आकडो की बाजीगरी पर जरा गौर फरमाये तो पता चलाता है कि ग्रामिण यांत्रिकी विभाग के पास 167 स्वीकृत है जिसमें से उसने मात्र 19 कार्य पूर्ण तथा 78 कार्यो को प्रगति पर बता कर स्वीकृत लागत राशी 3019.581 लाख रूपये में से अभी तक 996.574 लाख रूपये खर्च कर डाले।
                        इसी कडी में जल संसाधन विभाग ने कुल स्वीकृत 113 कार्यो में से एक भी कार्य को पूर्ण नहीं किया और कुल स्वीकृत 563.658 लाख रूपये में से कथित   23 कार्यो को प्रगति पर बता कर 166.866 लाख रूपये खर्च कर डाले। लोक निमार्ण विभाग ने अपने 8 स्वीकृत कार्यो में से एक भी कार्य को पूर्ण नही किया और 8 कार्यो को प्रगति पर बता कर कुल स्वीकृत 156.89 लाख रूपये में से 38.81 लाख रूपये खर्च कर डाले। सबसे अधिक वन विभाग ने अपनी पूरे जिले में फैली वन सुरक्षा समितियों की आड में 1027 कार्य स्वीकृत कर उनसे से मात्र 1 कार्य को पूर्ण बता कर 514 कार्यो की प्रगति के लिए स्वीकृत 2010.749 लाख रूपये में से 170.433 लाख रूपये का व्यय बता कर उक्त राशी का कथित कागजी गोलमाल करने मेें बाजीगरी दिखा डाली। सबसे आश्चर्य चकित करने वाली बात यह है कि फलोउद्यान विभाग ने मात्र एक कार्य को स्वीकृत करने में महारथ तो हासिल की पर उसे भी पूर्ण नहीं किया और उसकी प्रगति के लिए 8.33 लाख रूपये में से 6.85 लाख रूपये खर्च कर डाले। फलोउद्यान विभाग अपने इस कार्य को न तो दिखा सका है और न उसकी प्रगति को परिभाषित कर पाया है। कृषि विभाग ने भी अपने 4 स्वीकृत कार्यो को प्रगति पर बता कर एक कार्य को भी पूर्ण होना न बता कर उक्त कथित प्रगति के लिए 44.770 लाख रूपये में अभी तक 27.067 लाख रूपयो का बिल बाऊचर पेश कर सभी रूपयो को खातो से निकाल बाहर कर उसे रफा - दफा कर डाला। बैतूल जिले में 1 हजार 582 स्वीकृत कार्यो मेें मात्र 58 कार्य पूर्ण तथा 708 कार्य अपूर्ण है। जिले की विभागवार 7 निमार्ण एजेंसी कुल स्वीकृत राशी 5928.593 लाख रूपये में से 1406.60 लाख रूपये खर्च कर चुकी है। बैतूल जिले में किसानो को एक नारा देकर बहलाने एवं फुसलाने का काम किया गया कि हर खेत की मेड और हर मेड पर एक पेड लेकिन सच्चाई कुछ और ही बयंा करती है। सतपुडा की पहाडियों से घिरे बैतूल जिले में पानी के कथित बहाव एवं बाढ के पानी से भूमि के कटाव को रोकने के लिए 893.184 हेक्टर के क्षेत्रफल की भूमि को चिन्हीत किया जिसमें से 3.38.891 मीटर की भूमि पर कथित कंटूर ट्रंच का निमार्ण कार्य किया गया तथा उबड - खाबड भूमि को समतल करने के लिए भूमि शिल्प उप योजना के तहत 1035215मीटी भूमि पर कथित मेड बंधान का कार्य पूर्ण होना बताया गया लेकिन खेतो की मेड दिखाई दे रही है और समतल भूमि जिस पर रोजगार ग्यारंटी योजना का करोडो रूपैया पानी की तरह बहा दिया गया। बैतूल जिले में दस जनपदो से अध्यक्ष एवं मुख्यकार्यपालन अधिकारियों एवं 558 ग्राम पंचायतो के सरपंचो तथा सचिवो से प्रत्येक स्वीकृत कार्य के लिए तथा पूर्ण होने के बाद कथित चौथ वसूली के कारण ही बाहर से आने वाली रोजगार ग्यारंटी योजना की सर्वेक्षण टीम को मोटी रकम एवं उनकी कथित सेवा चाकरी के बल पर चिचोली जनपद पंचायत में सडको के किनारे लगवाई गई फैसिंग के सीमेंट के पोलो में लोहे की राड के बदले बास की कमचियों के मिलने के दर्जनो मामलो को नज़र अदंाज कर भारत सरकार के ग्रामिण रोजगार ग्यारंटी विभाग की टीम ने बैतूल जिले में बडे पैमाने पर हुये इस योजना में घोटले - भ्रष्ट्राचार - लूटखसोट - घटिया निमार्ण कार्य के मामलो को नज़र अंदाज कर अपनी जेबो की जगह सूटकेस भर - भर माल ले जाकर बैतूल जिले को रोजगार ग्यारंटी योजना में प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश में भी अव्वल नम्बर के जिलो की श्रेणी में ला खडा कर दिया। आज बैतूल जैसे आदिवासी जिले में मुख्यमंत्री के कथित साले होने का फायदा उठाने में जिले के वर्तमान कलैक्टर ने कोई कसर नहीं छोडी। आज अपनी पदौन्नति के बाद बैतूल जिले में मुख्यमंत्री को लोकसभा के चुनावो में बैतूल जिले से जीत का सेहरा बंधवाने के बाद ही बैतूल जिले से उनकी बिदाई संभव है लेकिन राजनैतिक गलियारे में चर्चा जोरो पर है कि उन्हे नर्मदापूरम संभाग का कमीश्रर बनाया जा ना था लेकिन सी बी आई द्धारा पारधी कांड में बैतूल के पूर्व कलैक्टर को भी आरोपी बनाये जाने के बाद से उन्हे तत्काल बैतूल जिले से हटाया गया. इस समय बैतूल जिले को चारागाह समझने वाले अफसरो में आरईएस के मेघवाल का नाम भी अव्वल दर्जे पर आता है। इस अधिकारी की बैतूल जिले में कमाई वाले विभाग में बरसो से अगंद के पांव की तरह जमें रहने के पीछे की सच्चाई के पीछे रोजगार ग्यारंटी योजना का पैसा ही दिखाई पडता है। जिले में ग्रामिणी यांत्रिकी विभाग को सबसे बडा कमाई का माध्यम मानने वाले लोगो में नेता - अभिनेता - अफसर यहाँ तक की पत्रकार भी शामिल है। बैतूल जिले में वित्तीय वर्ष 2006 एवं 2007 में जल संवर्धन एवं संरक्षण के 1 हजार 107 कार्य पूर्ण बताये गये जबकि वर्ष वित्तीय वर्ष 2007 से अप्रेल 2008 में 1957 कार्य तथा वर्तमान में वित्तीय वर्ष 2008 एवं 2009 में 526 कार्य पूर्ण बताये गये। इसी कडी में सुखे की कथित रोकथाम एवं वनीकरण के लिए पहले चरण में 754 कार्य तथा दुसरे चरण में 555 तथा तीसरे चरण में एक भी कार्य पूर्ण नहीं हो सके है। अभी तक वैसे देखा जाये तो जिले में प्रथम चरण में 8 निमार्ण एजेंसियो द्धारा 6 हजार 519 कार्य एवं 6840 कार्य प्रगति पर बताये गये। दुसरे चरण में   7052 कार्य पूर्ण तथा 11333कार्य प्रगति पर बताये गये। तीसरे चरण में 1924 कार्य पूर्ण तथा 12085 कार्य प्रगति पर बताये गये है। अभी तक कुल तीनो चरणो में 27643.249 लाख रूपये व्यय किये जा चुके है। बैतूल जिले में कमाई का जरीया बनी रोजगार ग्यारंटी योजना का सही ढंग से मूल्याकंन एवं सत्यापन हुआ तो जिले के कई अफसर और सरपंच एवं सचिव जेल के सखीचो के पीछे नज़र आयेगें लेकिन रोजगार ग्यारंटी योजना में बडे पैमाने पर भ्रष्ट्रचार करने वाले सरपंच - सचिवो से लेकर अधिकारी तक सभी राजनैतिक दलो एवं विचारो से जुडे होने के कारण सभी राजनैतिक दलो द्धारा केवल दिखावे के लिए रोजगार ग्यारंटी योजना में धांधली एवं भ्रष्ट्राचार की बाते कहीं जाती रही है। अब देखना बाकी यह है कि आखिर कब तक फर्जी वाडे के बल पर बैतूल जिला नम्बर अव्वल में आता रहेगा।
बैतूल से रामकिशोर पंवार
   

सूचना के अधिकार कानून 2005 के तहत आवेदक को चाही गई जानकारी असत्य या भ्रामक देने के संदर्भ में उचित कारवाई किए जाने बाबत्













प्रति,

1. आयुक्त

राज्य सूचना आयोग

सूचना भवन अरेेरा हिल्स

जेल पहाडी रोड भोपाल

2. प्रमुख सचिव

राज्य शिक्षा केन्द्र

पुस्तक भवन अरेरा हिल्स

जेल पहाडी रोड भोपाल

3.जिला कलैक्टर

जिला कलैक्टर कार्यालय

बैतूल मध्यप्रदेश

4.मुख्य कार्यपालन अधिकारी

जिला पंचायत

पंचायत भवन जिला बैतूल

5. जिला परियोजना समन्वयक

कार्यालय कलैक्टर (जिला शिक्षा केन्द्र) बैतूल

विषय:- सूचना के अधिकार कानून 2005 के तहत आवेदक को चाही गई जानकारी असत्य या भ्रामक देने के संदर्भ में उचित कारवाई किए जाने बाबत्

महोदय जी,

मैं आपका ध्यान मेरे द्वारा दिनांक  5 दिसम्बर 2016 को सूचना के अधिकार कानून 2005 के तहत जिला परियोजना समन्वयक  कार्यालय कलैक्टर (जिला शिक्षा केन्द्र) बैतूलमे एक आवेदन पत्र प्रस्तुत किया गया था जिसके सदंर्भ आपका ध्यान आकर्षित करवाने के साथ - साथ सूचना के अधिकार कानून के तहत उपलब्ध शक्तियों एवं प्रावधानो के तहत अनावेदक के विरूद्ध दण्डानात्मक उचित कार्रवाई की अपेक्षा करता हूं । इस संदर्भ में तीन अन्य पक्ष भी है जिनके समक्ष यह मामला में ला चुका हूं लेकिन तीनो पक्षो द्वारा चौथे पक्ष के विरूद्ध कोई कार्रवाई नही किए जाने से सूचना के अधिकार कानून के नियमो - कानूनो - प्रावधानो का उल्लघंन किया है जिसके उचित कार्रवाई को लेकर आवेदन पत्र प्रस्तुत है।

क. आवेदक को उसके द्वारा संलग्न आवेदन पत्र में चाही गई जानकारी के अनुसार चाही गई जानकारी चाहिए थी।

ख. आवेदक को दिनांक 8 दिसम्बर 2016 का संलग्न पत्र का अवलोकन करे एवं उसके अनुसार आवेदक को जिला परियोजना समन्वयक कार्यालय कलैक्टर (जिला शिक्षा केन्द्र) बैतूल द्वारा लिखित में यह जानकारी दी गई कि जिले के किसी भी बालिका छात्रवास में कोई सीसीटीवी कैमरे नही लगवाए गए है। अतः जानकारी निरंक है।

ग. इस संदर्भ में साक्ष्य क्रमांक 6 से लेकर 14 तक इस कथन को सिद्ध करते है कि उक्त दी गई जानकारी असत्य है क्योकि चिल्लौर में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए है।

घ. आवेदक को सूचना के अधिकार कानून के तहत भ्रामक , तथ्यहीन, असत्य, कूटरचित ,किसी के भविष्य का अहित करने वा जानकारी या साक्ष्य या दस्तावेज या लिखि कथन उपलब्ध करवाना कानूनी रूप से दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आता है।

सूचना का अधिकार कानून का मतलब है कि आवेदनकर्त्ता को सत्य जानकारी उपलब्ध करवाई जाए।

मान्वयर महोदय जी जिला परियोजना समन्वयक कार्यालय कलैक्टर (जिला शिक्षा केन्द्र) बैतूल द्वारा ऐसा न करके जो दण्डीय  अपराध या कृत्य या कार्य किया है उसके लिए उसे दण्ड देने से भविष्य में किसी भी सूचना प्राप्तकर्त्ता के साथ न्याय हो सकेगा।

धन्यवाद

3 मार्च 2017



भवदीय

         रामकिशोर पंवार

सूचना के अधिकार कानून 2005 के तहत आवेदक को चाही गई जानकारी असत्य या भ्रामक देने के संदर्भ में उचित कारवाई किए जाने बाबत्

प्रति,
1. आयुक्त
राज्य सूचना आयोग
सूचना भवन अरेेरा हिल्स
जेल पहाडी रोड भोपाल
2. प्रमुख सचिव
राज्य शिक्षा केन्द्र
पुस्तक भवन अरेरा हिल्स
जेल पहाडी रोड भोपाल
3.जिला कलैक्टर
जिला कलैक्टर कार्यालय
बैतूल मध्यप्रदेश
4.मुख्य कार्यपालन अधिकारी
जिला पंचायत
पंचायत भवन जिला बैतूल
5. जिला परियोजना समन्वयक
कार्यालय कलैक्टर (जिला शिक्षा केन्द्र) बैतूल
विषय:-












सूचना के अधिकार कानून 2005 के तहत आवेदक को चाही गई जानकारी असत्य या भ्रामक देने के संदर्भ में उचित कारवाई किए जाने बाबत्
महोदय जी,
मैं आपका ध्यान मेरे द्वारा दिनांक  5 दिसम्बर 2016 को सूचना के अधिकार कानून 2005 के तहत जिला परियोजना समन्वयक  कार्यालय कलैक्टर (जिला शिक्षा केन्द्र) बैतूलमे एक आवेदन पत्र प्रस्तुत किया गया था जिसके सदंर्भ आपका ध्यान आकर्षित करवाने के साथ - साथ सूचना के अधिकार कानून के तहत उपलब्ध शक्तियों एवं प्रावधानो के तहत अनावेदक के विरूद्ध दण्डानात्मक उचित कार्रवाई की अपेक्षा करता हूं । इस संदर्भ में तीन अन्य पक्ष भी है जिनके समक्ष यह मामला में ला चुका हूं लेकिन तीनो पक्षो द्वारा चौथे पक्ष के विरूद्ध कोई कार्रवाई नही किए जाने से सूचना के अधिकार कानून के नियमो - कानूनो - प्रावधानो का उल्लघंन किया है जिसके उचित कार्रवाई को लेकर आवेदन पत्र प्रस्तुत है।
क. आवेदक को उसके द्वारा संलग्न आवेदन पत्र में चाही गई जानकारी के अनुसार चाही गई जानकारी चाहिए थी।
ख. आवेदक को दिनांक 8 दिसम्बर 2016 का संलग्न पत्र का अवलोकन करे एवं उसके अनुसार आवेदक को जिला परियोजना समन्वयक कार्यालय कलैक्टर (जिला शिक्षा केन्द्र) बैतूल द्वारा लिखित में यह जानकारी दी गई कि जिले के किसी भी बालिका छात्रवास में कोई सीसीटीवी कैमरे नही लगवाए गए है। अतः जानकारी निरंक है।
ग. इस संदर्भ में साक्ष्य क्रमांक 6 से लेकर 14 तक इस कथन को सिद्ध करते है कि उक्त दी गई जानकारी असत्य है क्योकि चिल्लौर में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए है।
घ. आवेदक को सूचना के अधिकार कानून के तहत भ्रामक , तथ्यहीन, असत्य, कूटरचित ,किसी के भविष्य का अहित करने वा जानकारी या साक्ष्य या दस्तावेज या लिखि कथन उपलब्ध करवाना कानूनी रूप से दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आता है।
सूचना का अधिकार कानून का मतलब है कि आवेदनकर्त्ता को सत्य जानकारी उपलब्ध करवाई जाए।
मान्वयर महोदय जी जिला परियोजना समन्वयक कार्यालय कलैक्टर (जिला शिक्षा केन्द्र) बैतूल द्वारा ऐसा न करके जो दण्डीय  अपराध या कृत्य या कार्य किया है उसके लिए उसे दण्ड देने से भविष्य में किसी भी सूचना प्राप्तकर्त्ता के साथ न्याय हो सकेगा।
धन्यवाद
3 मार्च 2017

भवदीय
         रामकिशोर पंवार 

Wednesday, February 23, 2011

Ramkishore Pawar Rondhawala: धारवंशी पंवार करते हैं अपने पराक्रमी राजा भोज का ह...

Ramkishore Pawar Rondhawala: धारवंशी पंवार करते हैं अपने पराक्रमी राजा भोज का ह...: "धारवंशी पंवार करते हैं अपने पराक्रमी राजा भोज का हार्दिक अभिनंदन - वंदन - स्वागत आप हमारे राजा , हम हैं आपकी प्रजा रामकिशोर पंवार ''..."

धारवंशी पंवार करते हैं अपने पराक्रमी राजा भोज का हार्दिक अभिनंदन - वंदन - स्वागत आप हमारे राजा , हम हैं आपकी प्रजा रामकिशोर पंवार '' रोंढ़ावाला '' धार को छोड़ कर आए सैकड़ो पंवारों में मेरे अपने पूर्वज भी होगें जिन्होने किसी मजबुरी में अपनी राजधानी धार को छोड़ कर सतपुड़ाचंल, विंध्याचंल, मराठवाड़ा , खानदेश में शरण ली थी। धार छोड़ कर मंझधार में अटके पंवारों को अब स्वंय की पचहान नहीं छुपानी पडेंगी क्योकि अब कोई दुराचारी औरंगजेब उन्हे धर्मान्तरण के लिए बाध्य नहीं करेगा। अपनी पहचान बचाने के लिए बीहड़ जंगलों में बस गए पंवारों को एक हजार साल बाद अपने राजा के साथ अपनी राज्य एवं राजधानी भोजपाल में मान - सम्मान के साथ अपनी बसाई राजधानी को पुन: पाने का गौरव मिलने जा रहा हैं। अपनी पहचान छुपाने वाले इन पंवारों को अब यह बताना जरूरी नहीं होगा कि वे पिछड़ी जाति के हैं क्योंकि पंवार वंश की उत्पत्ति अग्रि से होने के कारण वे अग्रिवंशी कहे जातें हैं। पंवार राजपूत न छोड़ कर क्षत्रिय हैं इसलिए उन्हे स्वंय को राजपूत के बदले क्षत्रिय कहलाना ज्यादा उचित होगा। पंवार वंश क्षत्रियों की वह शाखा है जिसका इतिहास शौयगाथाओं एवं कला संस्कृति से भरा हुआ हैं। संस्कारधनी धारा नगरी जो वर्तमान में धार कहलाता हैं उसकी मिटट्ी से आने वाली सुगंध पंवार वंश के राजाओं का कीर्ति यश का गान करती हैं। मां वाग्यदेवी के उपासक राजा भोज के द्वारा पूरे देश में अपनी पहचान बनायें रखी धारा नगरी पूरी दुनिया में अपनी कला एवं संस्कृति की वह बेमिसाल धरोहर हैं जिसे आज अग्रेंजो ने अपने म्यूजियम में स्थापित कर रखा हैं। आज एक हजार साल बाद हमारे राजा अपने राज्य में बसने के लिए आए हैं। अब वह दिन दूर नहीं जब हमारे देश से अपने साथ विदेश ले गए अग्रेंजो के म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही मां वाग्यदेवी को भी धार की भोजशाला में लाकर स्थापित करने का सपना भी साकार हो जाएगा। राजा भोज को अपना मान - सम्मान वापस दिलवाने के लिए पूरी प्रदेश की सरकार एवं उसके मुखिया का धारवंशी पंवार आभार व्यक्त करते हैं। हमें अब पूरे देश के सामने अपने आप को अपनी पावन माटी को छोड़ कर भाग जाने का शर्मनाक अफसोस नहीं रहेगा क्योकि अब हमें अपना मान - सम्मान वापस मिलने जा रहा हैं। बसंत ऋतु के समाप्त होने के बाद फागुन मास में राजा भोज का भोपाल में वह भी उस झील के बीच - बीच स्थापित होने से उस झील का भी सीना फूल जाएगा जिसका निमार्ण उसके राजा भोज ने करवाया था। ताल - तलैया की नगरी भोजपाल में अपने राजा का अभिनंदन करते झील - सरोवर - जीव - जन्तु के अलावा पूरे देश में जा बसे धारवंशी पंवारों का दिल बाग - बाग उठा क्योकि चौड़ी छाती के साथ आदमकद से कई गुणा ऊंची राजा भोज की प्रतिमा अब लोगो के लिए धार और पंवार के इतिहास को जानने की जिज्ञासा को पैदा करेगा। अब हम स्वंय को गंगू तेली से ऊपर उठ कर देख पाएगें क्योकि शनि की कुदृष्टि अब राजा भोज के ऊपर से निकल रही हैं। शनि के प्रभाव के चलते राजा भोज को गंगू तेली के कोल्हू में बैल बन कर तेल की घानी को खीचना पड़ा था ठीक उसी प्रकार इस बार शनि की कुदृष्टि की वज़ह से अपने राज्य में सम्मान को तरसते राजा और उसकी प्रजा को मान और सम्मान उसी प्रकार मिल रहा है जिस प्रकार गंगू तेली के यहां पर काम करने से पूर्व छिन जाने के बाद मिला था। बैतूल जिले के सभी पंवारों को दुसरी बार स्वंय की पहचान को दुसरो के द्वारा बताए जाने के बाद जो अपार खुशी मिली वह देखने लायक हैं। बैतूल जिले में पहली बार आए प्रदेश के महामहिम राज्यपाल कुंवर मेहमुद अली ने स्वंय को धारवंशी पंवार का वंशज बता कर बैतूल जिले के पंवारों को सीना फूला कर चौड़ा कर दिया था। आज भले ही हमारे बीच राजा भोज और कुंवर मेहमुद अली खां नहीं है लेकिन राजा को पुन: अपने राज्य में बसने का अवसर देकर प्रदेश की सरकार ने धारवंशी पंवारो का दिल जीत लिया हैं। आने वाली 28 फरवरी को अधिक से अधिक संख्या में पूरे देश भर से आ रहे अग्रिवंशी धार के पंवारों की ओर से हम अपने राजा भोज का हार्दिक अभिनंदन - वंदन - स्वागत - सत्कार करते हैं।








धारवंशी पंवार करते हैं अपने पराक्रमी राजा भोज का हार्दिक अभिनंदन - वंदन - स्वागत
आप हमारे राजा , हम हैं आपकी प्रजा
रामकिशोर पंवार '' रोंढ़ावाला ''
धार को छोड़ कर आए सैकड़ो पंवारों में मेरे अपने पूर्वज भी होगें जिन्होने किसी मजबुरी में अपनी राजधानी धार को छोड़ कर सतपुड़ाचंल, विंध्याचंल, मराठवाड़ा , खानदेश में शरण ली थी। धार छोड़ कर मंझधार में अटके पंवारों को अब स्वंय की पचहान नहीं छुपानी पडेंगी क्योकि अब कोई दुराचारी औरंगजेब उन्हे धर्मान्तरण के लिए बाध्य नहीं करेगा। अपनी पहचान बचाने के लिए बीहड़ जंगलों में बस गए पंवारों को एक हजार साल बाद अपने राजा के साथ अपनी राज्य एवं राजधानी भोजपाल में मान - सम्मान के साथ अपनी बसाई राजधानी को पुन: पाने का गौरव मिलने जा रहा हैं। अपनी पहचान छुपाने वाले इन पंवारों को अब यह बताना जरूरी नहीं होगा कि वे पिछड़ी जाति के हैं क्योंकि पंवार वंश की उत्पत्ति अग्रि से होने के कारण वे अग्रिवंशी कहे जातें हैं। पंवार राजपूत न छोड़ कर क्षत्रिय हैं इसलिए उन्हे स्वंय को राजपूत के बदले क्षत्रिय कहलाना ज्यादा उचित होगा। पंवार वंश क्षत्रियों की वह शाखा है जिसका इतिहास शौयगाथाओं एवं कला संस्कृति से भरा हुआ हैं। संस्कारधनी धारा नगरी जो वर्तमान में धार कहलाता हैं उसकी मिटट्ी से आने वाली सुगंध पंवार वंश के राजाओं का कीर्ति यश का गान करती हैं। मां वाग्यदेवी के उपासक राजा भोज के द्वारा पूरे देश में अपनी पहचान बनायें रखी धारा नगरी पूरी दुनिया में अपनी कला एवं संस्कृति की वह बेमिसाल धरोहर हैं जिसे आज अग्रेंजो ने अपने म्यूजियम में स्थापित कर रखा हैं। आज एक हजार साल बाद हमारे राजा अपने राज्य में बसने के लिए आए हैं। अब वह दिन दूर नहीं जब हमारे देश से अपने साथ विदेश ले गए अग्रेंजो के म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही मां वाग्यदेवी को भी धार की भोजशाला में लाकर स्थापित करने का सपना भी साकार हो जाएगा। राजा भोज को अपना मान - सम्मान वापस दिलवाने के लिए पूरी प्रदेश की सरकार एवं उसके मुखिया का धारवंशी पंवार आभार व्यक्त करते हैं। हमें अब पूरे देश के सामने अपने आप को अपनी पावन माटी को छोड़ कर भाग जाने का शर्मनाक अफसोस नहीं रहेगा क्योकि अब हमें अपना मान - सम्मान वापस मिलने जा रहा हैं। बसंत ऋतु के समाप्त होने के बाद फागुन मास में राजा भोज का भोपाल में वह भी उस झील के बीच - बीच स्थापित होने से उस झील का भी सीना फूल जाएगा जिसका निमार्ण उसके राजा भोज ने करवाया था। ताल - तलैया की नगरी भोजपाल में अपने राजा का अभिनंदन करते झील - सरोवर - जीव - जन्तु के अलावा पूरे देश में जा बसे धारवंशी पंवारों का दिल बाग - बाग उठा क्योकि चौड़ी छाती के साथ आदमकद से कई गुणा ऊंची राजा भोज की प्रतिमा अब लोगो के लिए धार और पंवार के इतिहास को जानने की जिज्ञासा को पैदा करेगा। अब हम स्वंय को गंगू तेली से ऊपर उठ कर देख पाएगें क्योकि शनि की कुदृष्टि अब राजा भोज के ऊपर से निकल रही हैं। शनि के प्रभाव के चलते राजा भोज को गंगू तेली के कोल्हू में बैल बन कर तेल की घानी को खीचना पड़ा था ठीक उसी प्रकार इस बार शनि की कुदृष्टि की वज़ह से अपने राज्य में सम्मान को तरसते राजा और उसकी प्रजा को मान और सम्मान उसी प्रकार मिल रहा है जिस प्रकार गंगू तेली के यहां पर काम करने से पूर्व छिन जाने के बाद मिला था। बैतूल जिले के सभी पंवारों को दुसरी बार स्वंय की पहचान को दुसरो के द्वारा बताए जाने के बाद जो अपार खुशी मिली वह देखने लायक हैं। बैतूल जिले में पहली बार आए प्रदेश के महामहिम राज्यपाल कुंवर मेहमुद अली ने स्वंय को धारवंशी पंवार  का वंशज बता कर बैतूल जिले के पंवारों को सीना फूला कर चौड़ा कर दिया था। आज भले ही हमारे बीच राजा भोज और कुंवर मेहमुद अली खां नहीं है लेकिन राजा को पुन: अपने राज्य में बसने का अवसर देकर प्रदेश की सरकार ने धारवंशी पंवारो का दिल जीत लिया हैं। आने वाली 28 फरवरी को अधिक से अधिक संख्या में पूरे देश भर से आ रहे अग्रिवंशी धार के पंवारों की ओर से हम अपने राजा भोज का हार्दिक अभिनंदन - वंदन - स्वागत - सत्कार करते हैं।  

Thursday, January 13, 2011

''छबि तुझे सलाम ....!''










''छबि तुझे सलाम ....!'' 
लेख:- रामकिशोर पंवार ''रोंढ़ा वाला'' 
 ''जननी से बड़ी होती है जन्मभूमि''  उसका कर्ज अदा करना सबसे पहला धर्म है. लोगो ने कहा भी है कि ऋण कई प्रकार के होते है. जिसमें एक ऋण उस भूमि का भी होता है जहां पर आपका जन्म हुआ है. कई बार ग्रामीण आम बोलचाल की भाषा में लोग किसी को कहीं जाने के लिए बाध्य करते है और वह जब जाने से मना कर देता है तो लोग उसे ताना मारते है  ''क्यो यहां पर तेरा नरा गड़ा है क्या..!''  नरा का अभी प्राय: उस नली से होता है जो गर्भ में शीशु को प्राण वायु से लेकर आहार तक पहुंचाती है. बच्चे का जब जन्म होता है तब दाई या गांव की बड़ी - बर्जुग महिला उस नली को तेज धारधार चाकु - छुरी - हथियार से काट कर उसे घर के ही किसी कोने में गाड़ देती है . ऐसा पहले होता था लेकिन अब तो नर्स और मंहगे हास्पीटलो के कारण गांवो के बच्चो के भी भी वह नली कहां गायब हो जाती है किसी को पता तक नहीं है. आज यही कारण है कि इस नई पौध का अपने गांव या जन्मस्थान से मोह नहीं होता क्योकि उनकी जन्मभूमि तो हास्पीटल का प्रसुति जननी कक्ष होता है इसलिए उसके मन - दिल - दिमाग में अपनी जन्मभूमि के प्रति वह प्यार या अपनत्वपन दिखाई नहीं देता जो मुझे राजस्थान के उस छोटे से गांव सोढ़ा की ग्राम पंचायत सरपंच सुश्री छबि राजावत के दिलोदिमाग में दिखाई दिया. राजस्थान जहां पर लड़की का पैदा होना अभिश्राप माना जाता है. जहां पर पैदा होते ही लड़कियो को मार दिया जाता है. उस राजस्थान के एक छोटे से गांव में जन्मी लड़की ने एम बी ए की पढ़ाई करने के बाद देश - विदेश की हाई प्रोफाईल नौकरी - जाब को छोड़ कर गांव की सरपंची करने का मन बना कर अपने गांव को लौटना रास आया तो ऐसी लड़की की जितनी तारीफ की जाये कम है. मेरा मन तो ए आर रहमान की तर्ज पर  ''छबि तुझे सलाम ......!''   कहने को उतावला हो रहा है. छबि की छबि को आंखो में देख कर नहीं लगता कि जींस टी शर्ट पहन कर घुडसवारी करने वाली इस शहरी लड़की का दिल अचानक कैसे पसीज गया और वह एसी - कुलर हाई प्रोफाइल जिदंगी को बाय - बाय करके गांव की रेतली मिटट्ी में आकर रम गई. छबि को देखने के बाद ऐसा लगा कि राजस्थान जिसके बारे में कहा जाता है कि  ''इस मिटट्ी का तिलक करना चाहिये , क्योकि यह मिटट्ी - रेत उस राजस्थान की है जहां पर शौर्य और वीरता का इतिहास भरा पड़ा है...''  शौर्य गाथा वह भी राजस्थान की सुनने के बाद तो मुर्दे में भी जान आ जाती है. ऐसे प्रदेश की छबि को बार - बार मन सलाम करना चाहता है. पूरे देश में जी न्यूज पर दिन भर छाई रही छबि  की स्पेशल स्टोरी हर न्यूज चैनल पर विश्व महिला दिवस पर दिखाई गई कि वह किस तरह एम बी ए की शिक्षा प्राप्त करने के बाद आई टी सिटी पुना को बाय - बाय करके अपने गांव को लौट आई. किसी फिल्मी तारीका या माडल से कम न दिखने वाली छबि जब जी न्यूज की महिला आरक्षण को लेकर बहस में हिस्सा लेकर अच्छे - अच्छे नेताओ की बोलती बंद करके उन्हे चैलेंज करती थी कि गांव की महिलाओ को भी आत्म सम्मान मिलता है यदि आपकी नीयत साफ हो .....? छबि सभी से कहती थी कि वे लोग मेरे गांव को आकर देखे और वहां की महिला पंचो से मिले और उनसे पुछे कि वे पहले और अब के समय कैसा महसुस कर रही है. ग्राम पंचायतो में आरक्षण के बाद आरक्षित पद पर सरपंच का चुनाव दो अन्य महिलाओं को हरा कर जीती छबि कहती है कि  ''इस गांव में कभी मेरे दादा सरपंच थे , आज मैं सरपंच बनी हूं .''   महिलाओ को आत्म सम्मान देने से ही आपकी नीयत का पता लगता है. छबि को देख कर एक बार फिर मुझे बेटी के न होने का दर्द होने लगा. काश मेरी भी बेटी होती , वह भले एम बी ए पास न होकर यदि बारह क्लास तक पास होने के बाद मेरे गांव की सरपंच बनती तो शायद मुझे ऐसा लगता कि मैने उसके बहाने अपनी जन्मभूमि का थोड़ा - बहुंत कर्ज अदा कर दिया. गांव की पेयजल समस्या हो या फिर गांव की सड़क हर जगह छबि के रूप में काम करती मेरी बेटी की कल्पना ने आज इस लेख की रचना ही कर डाली. समाज में मरी तरह सोचने वालो की कमी नहीं है पर क्या करे जहां वंश चलाने की बात आती है तो वे लोग बेटे की चाह को पाल लेते है. एक प्रकार से देखा जाये तो वंश बेटी भी चलाती है. आखिर छबि ने अपने दादा का बार - बार जिक्र करके उस राजावत वंश को भी तो एक नाम और पहचान दी है. जिसे कल तक राजस्थान की सोढ़ा ग्राम पंचायत के लोग ही जानते थे. मात्र 15 सौ की आबादी में 15 परिवारो के इस राजावत परिवार की इस छोरी ने वो काम कर डाला कि कई पीढ़ी उसे याद रखेगी. आज मेरी मृत अबभिलाषा ने एक बार फिर उस टीस को जिंदा करके मुझे रोने को मजबुर कर दिया कि मैं अपने जीवन में अपनी बेटी का कन्यादान नहीं कर पाऊंगा.....? बेटी की कमी उस व्यक्ति को ज्यादा होती है जिसकी अपनी कोई बेटी नहीं होती है. आज के समय मैं अपने ही अपने भाई समकक्ष मित्र एवं गुरू अजय कुमार वर्मा की किस्मत की सराहना करना चाहुंगा जिनकी बेटियो ने आई टी के क्षेत्र में बैतूल बाजार से लेकर विदेशो तक में जाकर अपने माता - पिता का नाम ऊंचा कर दिया. अजय भैया की बेटियो ने जो आज मुकाम हासिल किया उसके पीछे उसकी मम्मी का हाथ जरूर है क्योकि अपने जमाने की अग्रेंजी में एम ए शिक्षा प्राप्त हमारी इस भाभी ने अपने सपनो को अपनी बेटियो के साथ साकार कर लिया. आज के समय अजय भैया एवं भाभी दोनो को सलाम करने को मन करता है. वह इसलिए नहीं कि वे मेरे भैया - भाभी है वह इसलिए कि उन्होने ने मेरी उस नन्ही सी भतीजी मोना को सोना बना डाला. आज लाखो - करोड़ो की मालीक बनी मोना किसी सोने से कम नहीं है. उसने मां की शिक्षा और दिक्षा का पूरा फायदा उठाया और आज विदेश में अपने ही वर्मा वंश का नाम तो रोशन कर रही है. ऐसी बेटियो को बार - बार नमन - अभिनंदन और उनका चरण वंदन ...... आज पूरा देश महिला आरक्षण की बात को लेकर बहस और प्रतिष्ठा की लड़ाई को देख रहा है लेकिन कोई भी सही मायने में दुनिया की आधी आबादी की बर्बादी को नहीं रोक पा रहा है. महिला को आत्म सम्मान तभी मिलेगा जब हम उन्हे अपने बगल में बैठने का हक देगें. पूरे जीवन में शायद किसी भी महिला को शादी के बाद ऐसा दुसरा मौका बहुत कम ही मिलता है जब वह अपने पति याने पुरूष के बगल में बैठ पाती है. स्थिति तो यहां तक आज भी है गांवो में नहीं बल्कि शहरो में कि अपनी ही बेटी को लोग अपनी बगल में बैठने का अवसर तक नहीं देते. ऐसे में उसे समान अधिकार देने की बाते करना बेईमानी होगी. मैं बैतूल जैसे आदिवासी जिले के एक छोटे से गांव में रहता हँू लेकिन जब भी गांव आता - जाता रहता हँू तो मुझे बार - बार उस कर्जदार की दुत्कार सुनाई देती है जो मुझे लताड़ता है कि  ''तू अपनी जन्मभूमि का कर्ज कब अदा करेगा......!''  आज वास्तव में मेरे अपने गांव  की दशा और दिशा के लिए मैं भी कुछ हद तक जिम्मेदार हूं. मुझे शहरो का मोह छोड़ कर गांव की उस पगडंडी को पकडना चाहिये जो कि मेरा बरसो से इंतजार कर रही है. लोग गांव छोड़ कर जा रहे है पर मैं शहर छोड़ कर गांव नहीं जा पा रहा हँू. हालाकि मैं अकेला पैदल ही गांव के लिए निकलू तो दोपहर तक गांव पहुंच जाऊंगा लेकिन गांव में अपनी माता मैया और चम्पा के पेड़ के सिवाय मेरा अपना बचा ही क्या है. माता मैया और चम्पा का पेड़ भी पूरे गांव का है ऐसे में मैं सिर्फ यह कह सकता हँू कि  ''इस गांव में मेरा भी नरा गड़ा है इसलिए यह गांव मेरा भी है.....!''  चलते - चलते एक बार फिर मुझे और मेरे गांव को भी इस बात की तलाश रहेगी कि  ''काश मेरे गांव को भी कोई छबि मिल जाये ......!''